57. राग धनाश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग धनाश्री

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जसोदा, तेरौ चिरजीवहु गोपाल ।
बेगि बढ़ै बल सहित बिरध लट, महरि मनोहर बाल ॥
उपजि परयौ सिसु कर्म-पुन्य-फल, समुद-सीप ज्यौं लाल ।
सब गोकुल कौ प्रान-जीवन-धन, बैरिन कौ उर-साल ॥
सूर कितौ सुख पावत लोचन, निरखत घुटुरुनि चाल ।
झारत रज लागे मेरी अँखियनि रोग-दोष-जंजाल ॥

भावार्थ / अर्थ :– यशोदाजी! तुम्हारा गोपाल चिरजीवी हो । व्रजरानी ! तुम्हारा यह मनोहर
बालक बलराम के साथ शीघ्र बड़ा हो और दीर्घ बुढ़ापेतक रहे । पुण्य कर्मोंके फलसे यह
शिशु इस प्रकार उत्पन्न हुआ है मानो समुद्रकी सीपमें ( मोतीके बदले अकस्मात्) लाल
उत्पन्न हो जाय । समस्त गोकुलका यह प्राण है, जीवन-धन है और शत्रुओंके हृदयका
कण्टक (उन्हें पीड़ित करनेवाला) है । सूरदासजी कहते हैं–इसका घुटनों चलना देखकर
नेत्र कितना असीम आनन्द प्राप्त करते हैं । गोपिका यह आशीर्वाद देकर मोहनके शरीर
में लगी) धूलि झाड़ती है । (और कहती हैं) ‘इस लालके सब रोग, दोष एवं संकट मेरी
इन आँखोंको लग जायँ ।’

मैं मोही तेरैं लाल री ।
निपट निकट ह्वै कै तुम निरखौ, सुंदर नैन बिसाल री ॥
चंचल दृग अंचल पट दुति छबि, झलकत चहुँ दिसि झाल री ।
मनु सेवाल कमल पर अरुझे, भँवत भ्रमर भ्रम-चाल री ॥
मुक्ता-बिद्रुम-नील-पीत–मनि, लटकत लटकन भाल री ।
मानौ सुक्र-भौम-सनि-गुरु मिलि, ससि कैं बीच रसाल री ॥
उपमा बरनि न जाइ सखी री, सुंदर मदन-गोपाल री ।
सूर स्याम के ऊपर वारै तन-मन-धन ब्रजबाल री ॥

भावार्थ / अर्थ :– (गोपिका माता यशोदाजी से कहती है–)’व्रजरानी! मैं तो तुम्हारे लालपर
मोहित हो गयी हूँ । तुम तनिक अत्यन्त समीप आकर (इसके) सुन्दर बड़े बड़े नेत्रोंको
देखो तो । इसके चञ्चल नेत्र हैं , मुखपर तुम्हारे) अञ्चलके वस्त्रकी झलक शोभा दे
रही है और (मुखके) चारों ओर अलकें लटक रही हैं, मानो सेवारमें उलझे कमलपर दो भ्रमर
इधर-उधर घूम रहे हों । मोती, मूँगा, नीलम और पिरजाकी मणियों से जटित लटकन ललाटपर
लटक रही है, मानो शुक्र, मंगल, शनि और बृहस्पति चंद्रमाके ऊपर एकत्र होकर शोभा दे
रहे हों ! सखी ! सुन्दर मदनगोपालकी उपमाका वर्णन नहीं किया जाता ।’ सूरदासजी
कहते हैं कि व्रजकी स्त्रियाँ श्यामसुन्दरके ऊपर अपना तन,मन, धन न्योछावर किये देती
हैं ।
रागबिलावल

[78]

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कल बल कै हरि आरि परे ।
नव रँग बिमल नवीन जलधि पर, मानहुँ द्वै ससि आनि अरे ॥
जे गिरि कमठ सुरासुर सर्पहिं धरत न मन मैं नैंकु डरे ।
ते भुज भूषन-भार परत कर गोपिनि के आधार धरे ॥
सूर स्याम दधि-भाजन-भीतर निरखत मुख मुख तैं न टरे ।
बिबि चंद्रमा मनौ मथि काढ़े, बिहँसनि मनहुँ प्रकास करे ॥

भावार्थ / अर्थ :– कलबल करते (तोतली बोली बोलते हुए) श्याम मचल रहे हैं। (दही मथनेका मटका
पकड़े वे ऐसे लगते हैं ) मानो नवीन रंगवाले निर्मल नये समुद्र (क्षीरसागर) पर दो
चन्द्रमा आकर रुके हों । जिस भुजा से (समुद्र मन्थनके समय) मन्दराचलको, कच्छपको,
देवताओं तथा दैत्यों को एवं वासुकि नागको धारण करतें (सबको सहायता देते) मनमें तनिक
भी डरे (हिचके) नहीं, वही भुजाएँ आज आभूषणोंके भार से गिरी पड़ती हैं (सँभाली नहीं
जाती) उन्हें गोपियों के हाथके आधार पर (गोपीकी भुजापर) रखे हुए हैं । सूरदासजी
कहते हैं कि श्यामसुन्दर दही के मटके के भीतर अपने मुख का प्रतिबिम्ब देखते हुए,
माता के मुखके पाससे अपना मुख हटाते नहीं हैं । ऐसा लगता है मानो (क्षीरसागरका)
मन्थन करके दो चन्द्रमा निकाले गये हैं, बार-बार हँसना ही मानो चन्द्रमाका प्रकाश
हो रहा है ।

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जब दधि-मथनी टेकि अरै ।
आरि करत मटुकी गहि मोहन, वासुकि संभु डरै ॥
मंदर डरत, सिंधु पुनि काँपत, फिरि जनि मथन करै ।
प्रलय होइ जनि गहौं मथानी, प्रभु मरजाद टरै ॥
सुर अरु असुर ठाढ़ै सब चितवत, नैननि नीर ढरै ।
सूरदास मन मुग्ध जसोदा, मुख दधि-बिंदु परै ॥
जब श्यामसुन्दर दही मथनेकी मथानी पकड़कर अड़ गये, उस समय वे तो मटका पकड़कर
मचल रहे थे; किंतु वासुकि नाग तथा शंकरजी डरने लगे, मन्दराचल भयभीत हो गया, समुद्र

काँपने लगा कि कहीं फिर ये समुद्र-मन्थन न करने लगें । (वे मन-ही-मन प्रार्थना करने
लगे-)’प्रभो! मथानी मत पकड़ो, कहीं प्रलय न हो जाय, अन्यथा सृष्टिकी मर्यादा नष्ट
हो जायगी ।’ सभी देवता और दैत्य खड़े-खड़े देख रहे हैं, उसके नेत्रोंमें आँसू ढुलक
रहा है (कि फिर समुद्र मथना पड़ेगा) । सूरदासजी कहते हैं- (यह सब तो देवलोक में
हो रहा है पर गोकुलमें दही-मन्थनके कारण) श्यामके मुख पर दहीके छींटे पड़ते हैं,
(यह छटा देखकर) मैया यशोदाका मन मुग्ध हो रहा है ।

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