53. राग अहीरी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग अहीरी

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साँवरे बलि-बलि बाल-गोबिंद । अति सुख पूरन परमानंद ॥

तीनि पैड जाके धरनि न आवै । ताहि जसोदा चलन सिखावै ॥
जाकी चितवनि काल डराई । ताहि महरि कर-लकुटि दिखाई ॥
जाकौ नाम कोटि भ्रम टारै । तापर राई-लोन उतारै ॥
सेवक सूर कहा कहि गावै । कृपा भई जो भक्तिहिं पावै ॥

भावार्थ / अर्थ :– श्यामसुन्दर ! बालगोविन्द! तुमपर बार-बार बलिहारी । तुम अत्यन्त सुखदायी तथा पूर्ण
परमानन्दरूप हो । (देखोतो) पूरी पृथ्वी (वामनावतारमें) जिसके तीन पद भी नहीं हुई,
उसीको मैया यशोदा चलना सिखला रही हैं, जिसके देखने से काल भी भयभीत हो जाता है,
व्रजरानीने हाथमें छड़ी लेकर उसे दिखलाया (डाँटा) जिसका नाम ही करोड़ों भ्रमोंको
दूर कर देता है, (नजर न लगे, इसलिये) मैया उसपर राई-नमक उतारती हैं । यह सेवक
सूरदास आपके गुणोंका कैसे वर्णन करे ? आपकी भक्ति मुझे यदि मिल जाय तो यह आपकी
(महती) कृपा हुई समझूँगा ।

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