43. राग कान्हरौ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग कान्हरौ

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हरिकौ बिमल जस गावति गोपंगना ।
मनिमय आँगन नदराइ कौ, बाल-गोपाल करैं तहँ रँगना ॥
गिरि-गिरि परत घुटुरुवनि रेंगत, खेलत हैं दोउ छगना-मगना ।
धूसरि धूरि दुहूँ तन मंडित, मातु जसोदा लेति उछँगना ॥
बसुधा त्रिपद करत नहिं आलस तिनहिं कठिन भयो देहरी उलँघना ।
सूरदास प्रभु ब्रज-बधु निरखति, रुचिर हार हिय बधना ॥

भावार्थ / अर्थ :– गोपनारियाँ हरि के निर्मल यशका गान कर रही हैं । श्रीनन्दरायका आँगन
मणिजटित है, वहाँ गोपाल बालरूपमें घुटनों सरकते हैं । (उठनेके प्रयत्नमें) वे गिर-
गिर पड़ते हैं फिर घुटनों चलने लगते हैं । दोनों भाई बलराम-घनस्याम खेल रहे हैं ।
धूलिसे धूसर दोनोंके शरीर सुन्दर लग रहे हैं, माता यशोदा उन्हें गोदमें ले लेती हैं
(वामनावतारमें) पूरी पृथ्वीको तीन पदमें नाप लेनेमें जो नहीं थके, (गोकुलकी शिशु-
क्रीड़ामें) उनके लिये चौखट पार करना कठिन हो गया है । सूरदासजी कहते हैं–
मेरे स्वामीके वक्षःस्थलपर सुन्दर हार तथा बघनखा शोभित हो रहा है, व्रजकी गोपियाँ
उनकी इस शोभाको देख रही हैं ।

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