37. राग ललित – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग ललित

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(माई) बिहरत गोपाल राइ, मनिमय रचे अँगनाइ ,
लरकत पररिंगनाइ, घूटुरुनि डोलै ।
निरखि-निरखि अपनो प्रति-बिंब, हँसत किलकत औ,
पाछैं चितै फेरि-फेरि मैया-मैया बोलै ॥
जौं अलिगन सहित बिमल जलज जलहिं धाइ रहै,
कुटिल अलक बदन की छबि, अवनी परि लोलै ।
सूरदास छबि निहारि, थकित रहीं घोष नारि,
तन-मन-धन देतिं वारि, बार-बार ओलै ॥
सखी ! मणिमय सुसज्जित आँगनमें गोपाललाल क्रीड़ा कर रहे हैं । घुटनों चलते हैं,
चारों ओर सरकते-घूमते लड़खड़ाते हैं, बार-बार (मणीभूमिमें) अपना प्रतिबिंब

देख-देखकर हँसते और किलकारी मारते हैं, घूम-घूमकर पीछे देख-देखकर’मैया-मैया बोलते
हैं । जैसे मँडराते भौरोंके साथ निर्मल कमल पानी पर बहता जाता हो, इस प्रकार
घुँघराली अलकोंसे घिरे चंचल मुखकी शोभा मणिभूमिमें (प्रतिबिम्बित होकर) हो रही है ।
सूरदासजी कहते हैं कि इस शोभाको देखकर व्रजकी स्त्रियाँ थकित (शिथिलदेह) हो रहीं,
तन,मन, धन -वे निछावर किये देती हैं और बार-बार उसी (मोहन) की शरण लेती
(उसीको देखने आ जाती) हैं ।

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