35. राग धनाश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग धनाश्री

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खेलत नँद -आँगन गोबिंद ।
निरखि-निरखि जसुमति सुख पावति, बदन मनोहर इंदु ॥
कटि किंकिनी चंद्रिका मानिक, लटकन लटकत भाल ।
परम सुदेस कंठ केहरि-नख, बिच-बिच बज्र प्रवाल ॥
कर पहुँची, पाइनि मैं नूपुर, तन राजत पट पीत ।
घुटुरुनि चलत, अजिर महँ बिहरत, मुख मंडित नवनीत ॥
सूर बिचित्र चरित्र स्याम कै रसना कहत न आवैं ।
बाल दशा अवलोकि सकल मुनि, जोग बिरति बिसरावैं ॥

भावार्थ / अर्थ :– गोविन्द व्रजराज श्रीनन्दजीके आँगनमें खेल रहे हैं । माता यशोदा उनके
चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखको देख-देखकर अत्यन्त आनन्द पा रही हैं ।
मोहनकी कटिमें किंकिणी (करधनी) है । मस्तक पर चन्द्रिका है जिसके माणिक
की लटकन ललाट झूल रही है । अत्यन्त सुन्दर कण्ठमें बघनखा पहिनाया है, जिसकी मालामें
बीच-बीचमें हीरे और मूँगे लगे हैं । हाथों में पहुँची (गहना) है, चरणोंमें नूपुर
हैं, शरीरपर पीताम्बर शोभा दे रहा है । आँगनमें घुटनोंसे चलते हुए क्रीड़ा कर रहे
हैं, मुखमें माखन लगा है । सूरदासजी कहते हैं कि श्यामसुन्दरकी विचित्र लीलाका
वर्णन जिह्वासे हो नहीं पाता है । उनकी बालक्रीड़ाको देखकर सभी मुनिगण अपने योग
तथा वैराग्यको भूल जाते हैं ।

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