33. राग जैतश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग जैतश्री

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लालन, वारी या मुख ऊपर ।
माई मोरहि दौठि न लागै, तातैं मसि-बिंदा दियौ भ्रू पर ॥
सरबस मैं पहिलै ही वार््यौ, नान्हीं नान्हीं दँतुली दू पर ।
अब कहा करौं निछावरि, सूरज सोचति अपनैं लालन जू पर ॥

भावार्थ / अर्थ :– सूरदासजी कहते हैं कि (माता यशोदा आनन्दमग्न कह रही हैं) ‘मैं अपने
लालजीपर न्यौछावर हूँ । सखी कहीं मेरी ही नजर इसे न लग जाय,

इससे काजलकी बिन्दी इसकी भौंहपर मैंने लगा दी है । इसकी दोनों दँतुलियोंपर तो
मैंने अपना सर्वस्व पहिले ही न्यौछावर कर दिया । अब सोचती हूँ कि अपने लालजी पर
और क्या न्योछावर करूँ ।’

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