30. राग धनाश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग धनाश्री

भावार्थ:
पुत्रका मुख देखकर यशोदाजी उत्फुल्ल हो उठीं । दूधकी दँतुलियाँ देखकर वे अत्यन्त
हर्षित हुई, प्रेममें मग्न होकर अपने शरीरकी सुधि भूल गयीं । बाहर से उन्होंने
व्रजराज श्रीनन्दजीको बुलाया कि ‘यह सुखदायक दृश्य तो देखो ! (मोहनकी) तनिक-तनिक
-सी निकली दूधकी दँतुलियोंको देखकर अपने नेत्रों को सफल करो । आनन्दपूर्वक श्रीव्रज
राज तब वहाँ आये । मोहनका मुख देखकर उनके दोनों नेत्र तृप्त हो गये । सूरदासजी
कहते हैं कि श्यामके किलकारी लेते समय उनके दाँत इस प्रकार दीख पड़े, मानो कमलपुष्प
के ऊपर बिजली जड़ी हो ।

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