29. राग बिलावल – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिलावल

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नंद-घरनि आनँद भरी, सुत स्याम खिलावै ।
कबहिं घुटुरुवनि चलहिंगे, कहि बिधिहिं मनावै ॥
कबहिं दँतुलि द्वै दूध की, देखौं इन नैननि ।
कबहिं कमल-मुख बोलिहैं, सुनिहौं उन बैननि ॥
चूमति कर-पग-अधर-भ्रू, लटकति लट चूमति ।
कहा बरनि सूरज कहै, कहँ पावै सो मति ॥
आनन्दमग्न श्रीनन्दरानी अपने पुत्र श्यामसुन्दरको खेला रही हैं । वे ब्रह्मासे
मनाती हैं-‘मेरा लाल कब घुटनों चलने लगेगा । कब अपनी इन आँखों से मैं इसके
दूधकी दो दँतुलियाँ (छोटे दाँत) देखूँगी । कब यह कमल-मुख बोलने लगेगा और मैं उन
शब्दोंको सुनूँगी ।'( प्रेम-विभोर होकर वे पुत्रके ) हाथ, चरण, अधर तथा भौहोंका
चुम्बन करती हैं एवं लटकती हुई अलकोंको चूम लेती हैं । सूरदास ऐसी बुद्धि कहाँसे
पावे, कैसे इस शोभाका वर्णन करके बतावे ।

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नान्हरिया गोपाल लाल, तू बेगि बड़ौ किन होहिं ।
इहिं मुख मधुर बचन हँसिकै धौं, जननि कहै कब मोहिं ॥
यह लालसा अधिक मेरैं जिय जो जगदीस कराहिं ।
मो देखत कान्हर इहिं आँगन पग द्वै धरनि धराहिं ॥
खेलहिं हलधर-संग रंग-रुचि,नैन निरखि सुख पाऊँ ।
छिन-छिन छिधित जानि पय कारन, हँसि-हँसि निकट बुलाऊँ ॥
जअकौ सिव-बिरंचि-सनकादिक मुनिजन ध्यान न पावै ।
सूरदास जसुमति ता सुत-हित, मन अभिलाष बढ़ावै ॥

भावार्थ / अर्थ :– (माता कहती है-) ‘मेरे नन्हें गोपाल लाल ! तू झटपट बड़ा क्यों नहीं हो जाता । पता
नहीं कब तू इस मुखसे हँसकर मधुर वाणीसे मुझे ‘मैया’ कहेगा-मेरे हृदयमें यही अत्यंत
उत्कण्ठा है । यदि इसे जगदीश्वर पूरा कर दें कि मेरे देखते हुए कन्हाई इस आँगनमें
पृथ्वी पर अपने दोनों चरण रखे (पैरों चलने लगे)

बड़े भाई बलरामके साथ वह आनन्दपूर्वक उमंगमें खेले और मैं आँखोंसे यह देखकर सुखी
होऊँ । क्षण-क्षणमें भूखा समझकर दूध पिलानेके लिये मैं हँस-हँसकर पास बुलाऊँ ।’ सूर
दासजी कहते हैं कि शंकरजी, ब्रह्माजी, सनकादि ऋषि मुनिगण ध्यानमें भी जिसे नहीं
पाते, उसी पुत्रके प्रेमसे माता यशोदा मनमें नाना प्रकारकी अभिलाषा बढ़ाया करती
हैं ।

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जसुमति मन अभिलाष करै ।
कब मेरो लाल घटुरुवनि रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै ॥
कब द्वै दाँत दूध के देखौं, कब तोतरैं मुख बचन झरै ।
कब नंदहिं बाबा कहि बोलै, कब जननी कहि मोहिं ररै ॥
कब मेरौ अँचरा गहि मोहन, जोइ-सोइ कहि मोसौं झगरै ।
कब धौं तनक-तनक कछु खैहै, अपने कर सौं मुखहिं भरै ॥
कब हँसि बात कहैगौ मौसौं, जा छबि तैं दुख दूरि हरै ।
स्याम अकेले आँगन छाँड़े, आप गई कछु काज घरै ॥
इहिं अंतर अँधवाह उठ्यौ इक, गरजत गगन सहित घहरै ।
सूरदास ब्रज-लोग सुनत धुनि, जो जहँ-तहँ सब अतिहिं डरै॥
श्रीयशोदाजी मनमें अभिलाषा करती हैं -‘मेरे लाल कब घुटनोंके बल सरकने लगेगा ।
कब पृथ्वीपर वह दो पद रखेगा । कब मैं उसके दूधके दौ दाँत देखूँगी । कब उसके मुखसे
तोतली बोली निकलने लगेगी । कब व्रजराजको ‘बाबा’ कहकर बुलावेगा, कब मुझे बार-बार
‘मैया-मैया’ कहेगा । कब मोहन मेरा अञ्चल पकड़कर चाहे जो कुछ कहकर (अटपटी-
माँगें करता) मुझसे झगड़ा करेगा । कब कुछ थोड़ा-थोड़ा खाने लगेगा । कब अपने हाथसे
मुखमें ग्रास डालेगा । कब हँसकर मुझसे बातें करेगा, जिस शोभासे दुःखका हरण कर लिया
करेगा।’ (इसप्रकार अभिलाषा करती माता) श्यामसुन्दरको अकेले आँगनमें छोड़कर कुछ
कामसे स्वयं घरमें चली गयी । इसी बीचमैं एक अंधड़ उठा, उसमें इतनी गर्जना हो
रही थी कि पूरा आकाश घहरा रहा (गूँज रहा) था । सूरदासजी कहते हैं कि व्रजके लोग
जो जहाँ थे, वहीं उस ध्वनिको सुनते ही अत्यन्त डर गये ।

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