27. राग बिलावल – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिलावल

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जसुमति भाग-सुहागिनी, हरि कौं सुत जानै ।
मुख-मुख जोरि बत्यावई, सिसुताई ठानै ॥
मो निधनी कौ धन रहै, किलकत मन मोहन ।
बलिहारी छबि पर भई ऐसी बिधि जोहन ॥
लटकति बेसरि जननि की, इकटक चख लावै ।
फरकत बदन उठाइ कै, मन ही मन भावै ॥
महरि मुदित हित उर भरै, यह कहि, मैं वारी ।
नंद-सुवन के चरित पर, सूरज बलिहारी ॥

सौभाग्यशालिनी श्रीयशोदाजी श्रीहरिको अपना पुत्र समझती हैं। (वात्सल्य प्रेम करती
हुई) उनके मुखसे अपना मुख सटाकर बातें करती हैं । श्यामसुन्दर लड़कपन ठान लेते हैं
(हाथसे मैयाकी नाक पकड़ लेते हैं) (वह कहती है-) ‘मुझ कंगालिनीका धन यह मनमोहन
किलकता (प्रसन्न) रहे । लाल! तेरे इस प्रकार देखने तथा तेरी छटापट मैं बलिहारी
हूँ ।’माताकी लटकती हुई बेसरपर मोहन एकटक दृष्टि लगाये हैं, कभी ओठ फड़काते हुए
मुख उठाकर मन-ही-मन मुदित होते हैं । व्रजरानी यह कहकर कि ‘लाल’ मैं तुझपर
न्यौछावर हूँ, हर्षित होकर प्रेम से उठाकर हृदय से लगा लेती हैं । सूरदास श्रीनन्द
नन्दनकी इस शिशुलीलापर बलिहारी जाता है ।

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