14. राग जैतश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग जैतश्री

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आजु बधाई नंद कैं माई । ब्रज की नारि सकल जुरि आई ॥
सुंदर नंद महर कैं मंदिर । प्रगट्यौ पूत सकल सुख- कंदर ॥
जसुमति-ढोटा ब्रज की सोभा । देखि सखी, कछु औरैं गोभा ॥
लछिमी- सी जहँ मालिनि बोलै । बंदन-माला बाँधत डोलै ॥
द्वार बुहाराति फिरति अष्ट सिधि । कौरनि सथिया चीततिं नवनिधि ॥
गृह-गृह तैं गोपी गवनीं जब । रंग-गलिनि बिच भीर भई तब ॥
सुबरन-थार रहे हाथनि लसि । कमलनि चढ़ि आए मानौ ससि ॥
उमँगी -प्रेम-नदी-छबि पावै । नंद-सदन-सागर कौं धावैं ॥
कंचन-कलस जगमगैं नग के । भागे सकल अमंगल जग के ॥
डोलत ग्वाल मनौ रन जीते । भए सबनि के मन के चीते ॥
अति आनंद नंद रस भीने । परबत सात रतन के दीने ॥
कामधेनु तैं नैंकु न हीनी । द्वै लख धेनु द्विजनि कौं दीनी ॥
नंद-पौरि जे जाँचन आए । बहुरौ फिरि जाचक न कहाए ॥
घर के ठाकुर कैं सुत जायौ । सूरदास तब सब सुख पायौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– सखी! आज श्री नन्दजीके यहाँ बधाई बज रही है । व्रजकी सभी नारियाँ
आकर एकत्र हो गयी हैं । व्रजराज श्रीनन्दजीके सुन्दर भवनमें सभी सुखोंका
निधान पुत्र प्रकट हुआ है । श्रीयशोदाजीका पुत्र तो व्रजकी शोभा है । सखी,
देखो! उसकी कान्ति ही कुछ और (अलौकिक) ही है । जहाँ लक्ष्मीजी-सी
देवियाँ मालिनी कहलाती हैं और बन्दनवारमें मालाएँ बाँधती घूमती हैं। आठों
सिद्धियाँ द्वारपर झाडू लगाती हैं । नवों निधियाँ द्वार-भितियोंपर स्वस्तिकके चित्र
बनाती हैं । जब गोपियाँ घर-घरसे चलीं, तब अनुरागमयी वीथियोंमें भीड़ हो गयी
उनके करोंमें सोनेके थाल ऐसे शोभा दे रहे थे मानो अनेकों चन्द्रमा कमलोंपर
बैठ-बैठकर आ गये हों (ये गोपियाँ) प्रेमसे उमड़ी नदियोंके समान

शोभा दे रही हैं, जो नन्दभवनरुपी समुद्रकी ओर दौड़ती जा रही हैं । भवनोंपर
मणि जटित स्वर्णकलश जगमग कर रहे हैं । आज विश्वके समस्त अमंगल भाग गये ।
गोप इस प्रकार घूम रहे हैं । मानो युद्धमें विजयी हो गये हों, सबकी मनो।़भिलाषा
आज पूरी हो गयी है । श्रीनन्दजीने अत्यन्त आनन्दरससे आर्द्र होकर रत्नोंके सात
पर्वत दान किये । जो गायें कामधेनुसे तनिक भी घटकर नहीं थीं
ऐसी दो लाख गायें ब्राह्मणोंको दान कीं । जो आज नन्दजीके द्वारपर माँगने आगये,
फिर कभी वे याचक नहीं कहे गये (उनसे इतना धन मिला कि फिर कभी माँगना नहीं पड़ा)
सूरदासजी कहते है-मेरे घरके (निजी) स्वामी (श्रीनन्दजी) के जब पुत्र उत्पन्न हुआ,
तब मैनें सब सुख पा लिया ।

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