विरह का अंग – कबीर के दोहे

विरह का अंग

– संत कबीर

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अंदेसड़ा न भाजिसी, संदेसौ कहियां ।
कै हरि आयां भाजिसी, कै हरि ही पास गयां ॥1॥

भावार्थ / अर्थ – संदेसा भेजते-भेजते मेरा अंदेशा जाने का नहीं, अन्तर की कसक दूर होने की नहीं, यह कि प्रियतम मिलेगा या नहीं, और कब मिलेगा; हाँ यह अंदेशा दूर हो सकता है दो तरह से – या तो हरि स्वयं आजायं, या मैं किसी तरह हरि के पास पहुँच जाऊँ

यहु तन जालों मसि करों, लिखों राम का नाउं ।
लेखणिं करूं करंक की, लिखि-लिखि राम पठाउं ॥2॥

भावार्थ / अर्थ – इस तन को जलाकर स्याही बना लूँगी, और जो कंकाल रह जायगा, उसकी लेखनी तैयार कर लूँगी । उससे प्रेम की पाती लिख-लिखकर अपने प्यारे राम को भेजती रहूँगी । ऐसे होंगे वे मेरे संदेसे ।

बिरह-भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ ।
राम-बियोग ना जिबै जिवै तो बौरा होइ ॥3॥

भावार्थ / अर्थ – बिरह का यह भुजंग अंतर में बस रहा है, डसता ही रहता है सदा, कोई भी मंत्र काम नहीं देता । राम का वियोगी जीवित नहीं रहता , और जीवित रह भी जाय तो वह बावला हो जाता है ।

सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त ।
और न कोई सुणि सकै, कै साईं के चित्त ॥4॥

भावार्थ / अर्थ – शरीर यह रबाब सरोद बन गया है -एक-एक नस तांत हो गयी है । और बजानेवाला कौन है इसका ? वही विरह, इसे या तो वह साईं सुनता है, या फिर बिरह में डूबा हुआ; यह चित्त ।

अंषड़ियां झाईं पड़ीं, पंथ निहारि-निहारि ।
जीभड़िंयाँ छाला पड़्या, राम पुकारि-पुकारि ॥5॥

भावार्थ / अर्थ – बाट जोहते-जोहते आंखों में झाईं पड़ गई हैं, राम को पुकारते-पुकारते जीभ में छाले पड़ गये हैं। [ पुकार यह आर्त्त न होकर विरह के कारण तप्त हो गयी है..और इसीलिए जीभ पर छाले पड़ गये हैं ।]

इस तन का दीवा करौ, बाती मेल्यूं जीव ।
लोही सींची तेल ज्यूं, कब मुख देखौं पीव ॥6॥

भावार्थ / अर्थ – इस तन का दीया बना लूं, जिसमें प्राणों की बत्ती हो ! और,तेल की जगह तिल-तिल बलता रहे रक्त का एक-एक कण । कितना अच्छा कि उस दीये में प्रियतम का मुखड़ा कभी दिखायी दे जाय ।

`कबीर’ हँसणां दूरि करि, करि रोवण सौं चित्त ।
बिन रोयां क्यूं पाइए, प्रेम पियारा मित्त ॥7॥

भावार्थ / अर्थ – कबीर कहते हैं – वह प्यारा मित्र बिन रोये कैसे किसीको मिल सकता है ? [रोने-रोने में अन्तर है । दुनिया को किसी चीज के लिए रोना, जो नहीं मिलती या मिलने पर खो जाती है, और राम के विरह का रोना, जो सुखदायक होता है।]

जौ रोऊँ तौ बल घटै, हँसौं तो राम रिसाइ ।
मन ही माहिं बिसूरणा, ज्यूँ घुँण काठहिं खाइ ॥8॥

भावार्थ / अर्थ – अगर रोता हूँ तो बल घट जाता है, विरह तब कैसे सहन होगा ? और हँसता हूं तो मेरे राम रिसा जायंगे । तो न रोते बनता है और न हँसते। मन-ही-मन बिसूरना ही अच्छा, जिससे सबकुछ खौखला हो जाय, जैसे काठ घुन लग जाने से ।

हांसी खेलौं हरि मिलै, कोण सहै षरसान ।
काम क्रोध त्रिष्णां तजै, तोहि मिलै भगवान ॥9॥

भावार्थ / अर्थ – हँसी-खेल में ही हरि से मिलन हो जाय,तो कौन व्यथा की शान पर चढ़ना चाहेगा भगवान तो तभी मिलते हैं, जबकि काम, क्रोध और तृष्णा को त्याग दिया जाय ।

पूत पियारौ पिता कौं, गौंहनि लागो धाइ ।
लोभ-मिठाई हाथि दे, आपण गयो भुलाइ ॥10॥

भावार्थ / अर्थ – पिता का प्यारा पुत्र दौड़कर उसके पीछे लग गया । हाथ में लोभ की मिठाई देदी पिता ने । उस मिठाई में ही रम गया उसका मन । अपने-आपको वह भूल गया, पिता का साथ छूट गया ।

परबति परबति मैं फिर््या, नैन गँवाये रोइ ।
सो बूटी पाऊँ नहीं, जातैं जीवनि होइ ॥11॥

भावार्थ / अर्थ – एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर मैं घूमता रहा, भटकता फिरा, रो-रोकर आँखे भी गवां दीं । वह संजीवन बूटी कहीं नहीं मिल रही, जिससे कि जीवन यह जीवन बन जाय, व्यर्थता बदल जाय सार्थकता में ।

सुखिया सब संसार है, खावै और सौवे ।
दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रौवे ॥12॥

भावार्थ / अर्थ – सारा ही संसार सुखी दीख रहा है, अपने आपमें मस्त है वह, खूब खाता है और खूब सोता है । दुखिया तो यह कबीरदास है, जो आठों पहर जागता है और रोता ही रहता है । [धन्य है ऐसा जागना, ओर ऐसा रोना !किस काम का,इसके आगे खूब खाना और खूब सोना!]

जा कारणि में ढूँढ़ती, सनमुख मिलिया आइ ।
धन मैली पिव ऊजला, लागि न सकौं पाइ ॥13॥

भावार्थ / अर्थ – जीवात्मा कहती है – जिस कारण मैं उसे इतने दिनों से ढूँढ़ रही थी, वह सहज ही मिल गया, सामने ही तो था । पर उसके पैरों को कैसे पकड़ू ? मैं तो मैली हूँ, और मेरा प्रियतम कितना उजला ! सो, संकोच हो रहा है ।

जब मैं था तब हरि नहीं , अब हरि हैं मैं नाहिं ।
सब अंधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहिं ॥14॥

भावार्थ / अर्थ – जबतक यह मानता था कि `मैं हूं’, तबतक मेरे सामने हरि नहीं थे । और अब हरि आ प्रगटे, तो मैं नहीं रहा । अँधेरा और उजेला एकसाथ, एक ही समय, कैसे रह सकते हैं ? फिर वह दीपक तो अन्तर में ही था ।

देवल माहैं देहुरी, तिल जे है बिसतार ।
माहैं पाती माहिं जल, माहैं पूजणहार ॥15॥

भावार्थ / अर्थ – मन्दिर के अन्दर ही देहरी है एक, विस्तार में तिल के मानिन्द । वहीं पर पत्ते और फूल चढ़ाने को रखे हैं, और पूजनेवाला भी तो वहीं पर हैं । [अन्तरात्मा में ही मंदिर है, वहीं पर देवता है, वहीं पूजा की सामग्री है और पुजारी भी वहीं मौजूद है ।]

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