मीराबाई के सुबोध पद

87. राग मलार
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लागी मोहिं नाम-खुमारी हो।।
रिमझिम बरसै मेहड़ा भीजै तन सारी हो।
चहुंदिस दमकै दामणी गरजै घन भारी हो।।
सतगुर भेद बताया खोली भरम -किंवारी हो।।
सब घट दीसै आतमा सबहीसूं न्यारी हो।।
दीपग जोऊं ग्यानका चढूं अगम अटारी हो।
मीरा दासी रामकी इमरत बलिहारी हो।।3।।
शब्दार्थ /अर्थ :- खुमारी =थकावट, हल्का नशा। मेहड़ा =मेघ, आशय प्रेम की भावना से है।
सारी =सारा अंग अथवा साड़ी। भरम-किंवारी =भ्रांतिरूपी किवाड़। दीपग =दीपक
जोऊं=जलाती हूं। अटारी =ऊंचा स्थान, परमपद से आशय है। इमरत =अमृत।

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