मीराबाई के सुबोध पद

86. राग श्रीरंजनी
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पायो जी म्हे तो राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु, किरपा कर अपनायो।।
जनम जनमकी पूंजी पाई, जगमें सभी खोवायो।
खरचै नहिं कोइ चोर न लेवै, दिन-दिन बढ़त सवायो।।
सतकी नाम खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो।
मीराके प्रभु गिरधर नागर, हरष हरष जस गायो।।2।।
शब्दार्थ /अर्थ :- म्हे = मैंने। पूंजी =मूल धन। खोवायो =खो दिया, त्याग दिया।
खेवटिया =मल्लाह। जस =गुण कीर्तन।
गुरु-महिमा
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