मीराबाई के सुबोध पद

79. राग झंझोटी
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भज ले रे मन, गोपाल-गुना।।
अधम तरे अधिकार भजनसूं, जोइ आये हरि-सरना।
अबिसवास तो साखि बताऊं, अजामील गणिका सदना।।
जो कृपाल तन मन धन दीन्हौं, नैन नासिका मुख रसना।
जाको रचत मास दस लागै, ताहि न सुमिरो एक छिना।।
बालापन सब खेल गमायो, तरुण भयो जब रूप घना।
वृद्ध भयो जब आलस उपज्यो, माया-मोह भयो मगना।।
गज अरु गीधहु तरे भजनसूं कोउ तर््यो नहिं भजन बिना।
धना भगत पीपामुनि सिवरी, मीराकीहू करो गणना।।1।।
शब्दार्थ /अर्थ :- गुनां = गुणों का। साखी =साक्षी, प्रमाण। सदना =भक्त सदन, कसाई।
रसना = जीभ। छिना =क्षण। धना =बड़ा, बहुत। गीध =जटायु से तात्पर्य है।
धना = एक हरिभक्त। सिवरी = शबरी भीलनी।

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