मीराबाई के सुबोध पद

74. राग धानी
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मैं गिरधर रंग-राती, सैयां मैं0।।
पचरंग चोला पहर सखी री, मैं झिरमिट रमवा जाती।
झिरमिटमां मोहि मोहन मिलियो, खोल मिली तन गाती।।
कोईके पिया परदेस बसत हैं, लिख लिख भेजें पाती।
मेरा पिया मेरे हीय बसत है, ना कहुं आती जाती।
चंदा जायगा सूरज जायगा, जायगी धरण अकासी।
पवन पाणी दोनूं ही जायंगे, अटल रहे अबिनासी।।
और सखी मद पी-पी माती, मैं बिन पियां ही माती।
प्रेमभठी को मैं मद पीयो, छकी फिरूं दिनराती।।
सुरत निरत को दिवलो जोयो, मनसाकी कर ली बाती।
अगम घाणि को तेल सिंचायो, बाल रही दिनराती।।
जाऊंनी पीहरिये जाऊंनी सासरिये, हरिसूं सैन लगाती।
मीराके प्रभु गिरधर नागर, हरिचरणां चित लाती।।3।।
शब्दार्थ : रंगराती = प्रेम में रंगी हुई। पचरंग =आशय है पंच तत्वों से बना हुआ
शरीर। चोला = ढीला ढाला कुर्ता; यहां भी आशय है शरीर से।
झिरमिट =” झुरमुट मारने का खेल, जिसमें सारा शरीर इस प्रकार ढक लिया जाता
है कि कोई जल्दी पहचान नहीं सके, अर्थात् कर्मानुसार जीवात्मा की योनि का
शरीरावरण-धारण।” गाती = शरीर पर बंधी हुई चादर, खोल मिली =आवरण हटा कर
तन्मय हो गई। धरण = धरती। और सखी =अन्य जीवात्माएं। माती =मतवाली।
बिन पियां =बिना पिये ही। सुरत = परमेश्वर की स्मृति। निरत =विषयों से विरक्ति
संजोले =सजा ले। भठी = भट्टी शराब बनाने की। सैन =संकेत।
टिप्पणी :– इस पद में निराकार, निर्गुण ब्रह्म से भक्तियोग के द्वारा साक्षात्कार
का स्पष्ट मार्ग दिखाया गया है, जो रहस्य का मार्ग है।

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