मीराबाई के सुबोध पद

67. राग खंभावती
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राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊं ए माय।
मैं मंदभागण परम अभागण, कीरत कैसे गाऊं ए माय।।
बिरह पिंजरकी बाड़ सखी रीं,उठकर जी हुलसाऊं ए माय।
मनकूं मार सजूं सतगुरसूं, दुरमत दूर गमाऊं ए माय।।
डंको नाम सुरतकी डोरी, कड़ियां प्रेम चढ़ाऊं ए माय।
प्रेम को ढोल बन्यो अति भारी, मगन होय गुण गाऊं ए माय।।
तन करूं ताल मन करूं ढफली, सोती सुरति जगाऊं ए माय।
निरत करूं मैं प्रीतम आगे, तो प्रीतम पद पाऊं ए माय।।
मो अबलापर किरपा कीज्यौ, गुण गोविन्दका गाऊं ए माय।
मीराके प्रभु गिरधर नागर, रज चरणनकी पाऊं ए माय।।7।।

शब्दार्थ /अर्थ :- हुलसाऊं = मन बहलाऊंगी। गमाऊं = गवां दूं,खो दूं। डाको =डंका।
कड़ियां =ढोल की डोरियां। मोरचंग =मुंह से बजाने का एक बाजा,मुंहचंग।
रज = धूल।

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