मीराबाई के सुबोध पद

63 राग पीलू

तेरो कोई नहिं रोकणहार, मगन होई मीरां चली।।
लाज सरम कुलकी मरजादा सिरसें दूर करी।
मान अपमान दोऊ धर पटके, निकसी ग्यान गली।।
ऊंची अटरिया लाल किंवडिया, निरगुण सेज बिछी।
पंचरंगी झालर सुभ सोहै फूलन बूल कली।।
बाजूबंद कडूला सोहे, सिंदूर मांग भरी।
सुमिरण थाल हाथ में लीन्हों, सोभा अधिक खरी।।
सेज सुखमणा मीरा सेहै, सुभ है आज घरी।
तुम जाओ राणा घर आपणे, मेरी थांरी नाहिं सरी।।3।।
शब्दार्थ /अर्थ :- सरम =शर्म। धर पटके = परवा नहीं की। गली =मार्ग।
किवडिया = किवाड़, द्वार। बाजूबंद =बांह पर पहनने का गहना। कड़ोला =कड़ा,

हाथ पर पहनने का गहना। खरी =अच्छी। सेज सुखमणा =सुषुम्ना नाड़ी से समाधि
लगाकर। सरी =बन गई।

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