मीराबाई के सुबोध पद

62. राग गुनकली
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मैं गिरधर के घर जाऊं।।
गिरधर म्हांरो सांचो प्रीतम देखत रूप लुभाऊं।।
रैण पड़े तबही उठ जाऊं, भोर भये उठ आऊं।
रैण दिना बाके संग खेलूं ज्यूं त्यूं ताहि रिझाऊं।
जो पहिरावै सोई पहिरूं, जो दे सोई खाऊं।
मेरी उणकी प्रीति पुराणी, उण बिन पल न रहाऊं।।
जहं बैठावें तितही बैठूं, बैचे तो बिक जाऊं।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर बार बार बलि जाऊं।।2।।
शब्दार्थ /अर्थ :- रैण =रात्रि। भोर =प्रातःकाल। ज्यूं त्यूं =जैसे तैसे, सब प्रकार से

उण =उन। बलि जाऊं =न्योछावर होती हूं।

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