मीराबाई के सुबोध पद

58. राग मांड
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स्याम, मने चाकर राखो जी। गिरधारीलाल, चाकर राखो जी।।
चाकर रहसूं बाग लगासूं, नित उठ दरसण पासूं।
बिंद्राबन की कुंज गलिन में तेरी लीला गासूं।।
चाकरी में दरसण पाऊं, सुमिरण पाऊं खरची।
भाव भगति जागीरी पाऊं, तीनूं बातां सरसी।।
मोर मुगट पीतांबर सोहे, गल बैजंती माला।
बिंद्राबन में धेनु चरावे, मोहन मुरलीवाला।
हरे हरे नित बाग लगाऊं,बिच बिच राखूं क्यारी।
सांवरियाके दरसण पाऊं,पहर कुसुम्मी सारी।।
जोगि आया जोग करणकूं, तप करणे संन्यासी।
हरी भजनकूं साधू आया, बिंद्राबनके बासी।।
मीराके प्रभु गहिर गंभीरा सदा रहो जी धीरा।
आधी रात प्रभु दरसन दीन्हें, प्रेम नदी के तीरा।।5।।
शब्दार्थ /अर्थ :- मने = मुझको। लगासूं =लगाऊंगी। गासूं =गुण गाऊंगी।
खरची =रोज के लिए खर्चा। सरसी = अच्छी से अच्छी। गहिरगंभीरा =शान्त
स्वभाव के। रहो धीरा =विश्वास रखो। तीरा =किनारा ,क्षेत्र।

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