मीराबाई के सुबोध पद

33. राग काफी
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घर आंगण न सुहावै, पिया बिन मोहि न भावै।।
दीपक जोय कहा करूं सजनी, पिय परदेस रहावै।
सूनी सेज जहर ज्यूं लागे, सिसक-सिसक जिय जावै।।
नैण निंदरा नहीं आवै।।
कदकी उभी मैं मग जोऊं, निस-दिन बिरह सतावै।
कहा कहूं कछु कहत न आवै, हिवड़ो अति उकलावै।।
हरि कब दरस दिखावै।।
ऐसो है कोई परम सनेही, तुरत सनेसो लावै।
वा बिरियां कद होसी मुझको, हरि हंस कंठ लगावै।।

मीरा मिलि होरी गावै।।33।।
शब्दार्थ /अर्थ :- दीपक जोय = दीपक जलाकर। नैण =नयन। निंदरा =नींद।
कदकी =कबकी। ऊभी =खड़ी। हिवड़ा = हृदय।अकलावै =व्याकुल हो रहा है।
सनेसो = सन्देश। बिरियां = समय। होसी =होगी।

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