उध्दव जी के कवित्त

ब्रज से लौटने पर उद्धव-वचन श्रीभगवान-प्रति
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आँसुनि की धार औ उभार कौं उसाँसनि के
तार हिचकिनि के तनक टरि लेन देहु ।
कहै रतनाकर फुरन देहु बात रंच
भावनि के बिषम प्रपंच सरि लेन देहु ।।
आतुर ह्वै और हू न कातर बनावौ नाथ
नैसुक निवारि पीर धीर धरि लेन देहु ।
कहत अबै हैं कहि आवत जहाँ लौं सबै
नैंकु थिर कढ़त करेजौ करि लेन देहु ।।

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रावरे पठाए जोग देन कौं सिधाए हुते
ज्ञान गुन गौरव के अति उदगार मैं ।
कहै रतनाकर पै चातुरी हमारी सबै

कित धौं हिरानी दसा दारुन अपार मैं ।।
उड़ि उधिरानी किधौं ऊरध उसासनि मैं
बहि धौं बिलानि कहूँ आँसुनि की धार मैं ।
चूर ह्वै गई धौं भूरि दुख के दरेरनि मैं
छार ह्वै गई धौं बिरहानल की झार मैं ।।

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सीत-घाम-भेद खेद-सहित लखाने सबै

भुले भाव भेदता निषेधन बिधान के ।
कहै रतनाकर न ताप ब्रजबालनि के
काली-मुख-ज्वाल ना दवानल समान के ।।
पटकि पराने ज्ञान-गठरी तहाँ हीं हम
थमत बन्यौ ना पास पहुँचि सिवान के ।
छाले परे पगनि अधर पर जाले परे
कठिन कसाले परे लाले परे प्रान के ।।

132
ज्वालामुखी गिरि तैं गिरत द्रवै द्रव्य कैधौं
बारिद पियौ है बारि बिषके सिवाने मैं ।
कहै रतनाकर कै काली दाँव लेन-काज
फेन फुफकारै उहिं गाँव दुख-साने मैं ।।
जीवन बियोगिनि कौ मेघ अंचयौ सो किधौं
उपच्यौ पच्यौ न उर ताप अधिकाने मैं ।
हरि-हरि जासौं बरि बरि सब बारी उठैं
जानैं कौन बारि बरसत बरसाने मैं ।।

133
लैके पन सूछम अमोल जो पठायौ आप
ताको मोल तनक तुल्यौ न तहाँ साँठी तैं ।
कहै रतनाकर पुकारे ठौर ठौर पर
पौरि वृषभानु की हिरान्यौ मति नाठी तैं ।।
लीजै हेरि आपुहीं न हेरि हम पायौ फेरि
याही फेर माहि भए माठी दधि-आँठी तैं ।
ल्याए धूरि पूरि अंग अंगनि तहाँ की जहाँ
ज्ञान गयौ सहित गुमान गिरि गाँठी तैं ।।

134
ज्यौंही कछु कहन संदेस लग्यौं त्यौंहीं लख्यौ
प्रेम-पूर उमँगि गरे लौं चढ़्यौ आवै है ।।
कहैरतनाकर न पाँव टिकि पावैं नैंकु
ऐसौ दृग-द्वारनि स-बेग कढ़्यौ आवै है ।।

मधुपुरि राखन कौ बेगि कछु ब्यौंत गढ़ौ
धाइ चढ़ौ बट कै न जौपै गढ़ यौ आवै है ।
आयौ भज्यौ भूपति भगीरथ लौं हौं नाथ
साथ लग्यौ सोई पुन्य-पाथ बढ़्यौ आवै है ।।

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जैहै ब्यथा विषम बिलाइ तुम्हैं देखत हीं
तातैं कही मेरी कहूँ झूँठि ठहरावौ ना ।
कहै रतनाकर न याही भय भाषैं भूरि
याही कहैं जावौ बस बिलँब लगावौ ना ।।
एतौ और करत निबेदन स बेदन हैं
ताकौ कछु बिलग उदार उर ल्यावौ ना ।
तब हम जानैं तुम धीरज-धुरीन जब
एक बार ऊधौ बनि जाइ पुनि जावौ ना ।।

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छावते कुटीर कहूँ रम्य जमुना कैं तीर
गौन रौन-रेती सौं कदापि करते नहीं ।
कहै रतनाकर बिहाइ प्रेम-गाथा गूढ़
स्रोन रसना मैं रस और भरते नहीं ।।
गोपी ग्वाल बालनि के उमड़त आँसू देखि
लेखि प्रलयागम हूँ नैंकु डरते नहीं ।
होतौ चित चाव जौ न रावरे चितावन को
तजि ब्रज-गाँव इतै पाँव धरते नहीं ।।

137
भाठी के बियोग जोग-जटिल-लुकाठी लाइ
लाग सौं सुहाग के अदाग पिघलाए हैं ।
कहै रतनाकर सुबृत प्रेम-साँचे माहिं
काँचे नेम संजम निबृत्त कै ढराए हैं ।।
अब परि बीच खीचि बिरह-मरीच-बिंब
देत लव लाग की गुबिंद-उर लाए हैं ।।
गोपी-ताप-तरुन-तरनि-किरनावलि के
ऊधव नितांत कांत-मनि बनि आए हैं ।

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** इति श्रीउद्धव-शतक **
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— शब्दार्थ —

चोप = उत्साह । तोम = समूह । अध = अन्दर । ऊरध = ऊपरी भाग । उमहि = उमंग ।
अभाय = निकलना । औचक = अचानक । बूझैं = पूछना । अचैन = व्याकुलता । कंज = कमल
मतंग = हाथी । मताए = मस्त । गुनन = गुनगुनाने लगे । जौलौं = जब तक । अधिकाई = दुख
महा = समुद्र के समान । गहबरि = गला भर आया । चुचाइ = बहना । पुतरीनि = पुतलियोंसे।
सुधाकर = चंद्रमासी । चलत न चारयो = किसी भी प्रकार से । गहीली = पागलपन ।
बिथके = चकित । कसकत = खटकता । गिरिबौ = बहती । तिनकौ अँवाँ = हमारे नेत्र
अवा के समान संतप्त हो रहे हैं । हिरिबौ = खोजा करते । गोरस = इंद्रिय सुख ।
नवेलिनि = नवयुवतियों । स्रमहार = थकावट । मनुहार = आदर सत्कार । पखौवनि = पंख ।
क्रीट = मुकुट । बलाइ = बाधा । माल = माला । अंसहू = लेशमात्र ।
गुन-पाल = रस्सी लंगर । नभ-गात = आकाश में उड़ जाते हैं । सील सनी = शीतलवायु ।
ओप = शोभा । मिदुराने = खोलने मूंदने से । बारि-बृंद = पानी के बादल ।
अचल = अधीर हो गए । कातरता = व्याकुलता । अवाइ = अवाक् । भूरि = आपके ।
भीति = भय । भारनि = बोझ । फनिंद-फन = शेषनाग घबड़ा उठे । बिधि =कला । ओप = चमक ।
बामनि = स्त्रियाँ । हेत-खेत = अनुरागरूपी खेत । गोपि = गुप्त । गमनौ = मत चलो ।
बारन भोले । बिबेक = ज्ञानी । सचोप = प्रकाश सहित । दिपत = दीप्त । थहिबौ = ढूंढा
करे । पसार = विस्तृत जगत । पागत = फंसाये । टोक = प्रयत्न । सीतल = ये आँसू ।
समन = शमन । निफल = निष्फल । मुखीनि = ब्रज युवतियाँ । जोति जोइ = ब्रह्म ज्योति ।
करेजे = हृदय । धीर धूरि भयौ = धैर्य धूल बनकर उड़ जाता । हूख = पीड़ा । भायनि =
भावो । गहबर = रूंधे । कढ़न = कहने । चल = बैचेनी । सकस्यौई = अटक गया ।
रस्यौई = बहने लगा । रोम-झंझरीनि = रोगटेरूपी झंझरियो से । आनन-दुवार = मुखद्वार ।
अकथ = अवर्णनीय गाथा । रोकै रुक गए । उरात = दौड़कर । सीरे तपे विबिध = सुख दुख के
संदेश । उछाह = उत्साह । हरैं -हरैं = धीरे धीरे । झार = झाड़ी । गुमान = गर्व ।
मारतंड = सूर्य । साने = मस्त । सिवाने = सरहद । मुरझाने = उदास । अवाई = आना ।
ख्वै = खोने लगी । म्वै रहीं = मार कर । पेखि = देखकर । पाती = समाचार ।
छाती छोहनि = हृदय से लगाने लगी । सनेस = सन्देश । कराहि = कराहकर ।
गरि गौ = नष्ट हो । सिहाने = विह्वल । सके से थके = किंकर्तव्य विमूढ़ ।
भभरे = भयभीत । भकुवाने = व्यंग । हौले से = धीरे से । हले से = अपने मार्ग से हट
कर । हूल-हूले = प्रसन्नता । हिराने से = हार मानकर । रति-माती = प्रेमोन्मत्त ।
उधिरानी = उधेड़ना । सुधि = स्मरण । सँघाती = मित्र । ताती = उन्नति ।
लच्छ = लक्ष्य । बिलस्यो = लगे रहेंगे । कंज = कली । जोहत = देखते हो ।
छोहि = क्षुब्ध । प्रभूतनि = प्राणियों । पटल = पर्दे । थानहिं = स्थान ।
थिरानी = स्थिर । बररानी = बड़ बड़ाने । बिथकानी = विशेष रूप से शिथिल ।
बिललानी = बैचैन । सुखानी = उदास । सु जोगनि = सुन्दर योग साधना के
सिराई = शान्त की । अनारिनि = मूर्खों की । सनेस = सन्देश । सूधो = सीधा ।
पारिहैं = रखेंगे । मीड़ि = मलकर । बिरद = यश । पाकसासन = इंद्र । पासनि = दिशा
पाँसुरी = नथूनों । उमाहि = उठकर । कैधौं अथवा । अनारी = मूर्खो । चोप = उल्लास ।
तूरि = तूरही । कच =केश । अरबिंद = पदम । काक चञ्चवत कोए के चोंच समान ।
धूरि-धारन = भस्मधारण । सारन = बुझाने । हेरैं = ढूढ़ने पर । पलथी मारकर ।
लौन = नमक । सुधाई = सीधेपन । गुन = रस्सी । बानक = रूप । बादि = व्यर्थ ही ।
निबेरी = निवृत । सासना = नियंत्रण करना । कमेरी = दासी । ओबरग = मोक्ष ।
भुक्ति = लौकिक सुख । साँसति = कष्ट पहुँचाता है । बयात = बकना । भव-गोपद =गाय रूपी
पद । भीति = दीवाल भय । निकाय = समूह । जमातें = समूह । भीति = दीवार । छातैं =छतें
अपर = अन्य । कौ =वाग्जाल । गिलि = निगल । लंकनि = कमर । पाला सरदी । स-साध = इच्छा
पूर्वक । प्रान-पट = वस्त्र । मधुपुरियान = मधुरवासी । कंखियाँ = मखियाँ ।
परकि = मिलजाता । सोग = शोक । स-कंप कँखियानि = काँपती हुई कोखों से ।लेखते = देखते
अदेख = अदृश्य । अँखियानि = दृष्टिकोण से । चुचात = टपकना । चित-चाह = मन की बात ।
हिरैहै = भूल जावेगा । उछाह = उत्साह । गुमान = गर्व । गोइ = छिपा रखो । भड़ंग =
भांड़पन । चंगे मुँह के लिये अच्छा है । उतंग = ऊँची । भुराइ भुलावे में डालकर ।
नाय = नाव पर । कूल = किनारे । हितकारी = सहारा देने वाले । न्यारी = अलग । तरल =
चंचल । तरंग = लहर । पारि = पार होकर । पराने = भाग गए । गुनवारी = रस्सी ।
परान्यौ = भगाया । विषम = तीक्ष्ण । बात = वायु । तपेला = तपने वाला ।
साँसति = रोकने । झारत = फैला रहे । अपेल = अटूट धारा । सखनि = सखा के ।
संदेसनि = सन्देशों द्वारा । भुजंगनि = सर्पिणी । दौनाचल = हमारा वियोग दुःख ।
कनूका = कण । छिगुनी = कनिष्टिका । पानि परिस हाथों के स्पर्श से । बात सौं = बातों
की वायु से । ढाइ = नष्ट करके । बियौ = उत्पन्न न हुआ । छीन = जर्जर । बसीठ = दूत ।
अँदेश = संसय है । बंचक = ठग । सरोजनि = कमठ । मकरंद = पराग । ढरारे = ढलकता ।
गारे = गिरा रहे । मधु = निर्गुन ज्ञान का भ्रमर । अछेह अनिष्ट । बगारे = फैला रहा
। बेरि = बार । फाटी = फट पड़ी । कौन धौं = कौन सा । निराटी = नवीन । आँटि = अटकाकर
अलच्छ = अदृष्ट । पच्छवारे = पक्ष करने वाले । लाइ = आग । पसारे = फैला रहे । ढरारे
= ढलकते हो । छतीसे चालक । बीरबावन = बड़ा चतुर वीर । कलाँच = अंशभूत ।
छठैं-आठैं = वियोग । तीन-तेरह = किसी काम का न रहना । तीन-पाँच कलह करना ।
चनूर = चाणूर । सुखमूरि = श्रीकृष्ण । क्रूर = कठिन । जोग-मंतर = शक्ति । बिलग =
अलग करना । तिन्हैं = कृष्ण । चेतवारे =जागृत । प्रियप्रान =कृष्ण । पुरतीं = पूर्ण
करती । किरचैं = टुकड़े । कुभाय = चमकाने वाला । भावते = अच्छे । कीरति = दृढ़ व्रत
का यश । पतोहू = सौत । पानिप = द्युति , चमक । भाजन = पात्र । तपाक = वेग ।
ब्रह्मद्रव = श्रीकृष्ण शोभारस । कौं = के साथ । हर-गिरि = कैलाश । सराहि = प्रशंसा
चख = नेत्र । लोपक = लोप करने वाला । बसंतिकावली = सरसों । बोरै = बौर से लदे ।
लसत = शोभित । रसाल-बर = श्रेष्ठआम । बारिनि = वाटिकाओं के तथा स्त्रियों के ।
चबाव = उपहास चर्चा । झार = विरह लपटें । बैहरि = भयानक । ठाम-ठाम = ग्रीष्मकाल में
चबाई-बात = कुटिल वायु, वार्तालाप । पत-छीन = लज्जा रहित । अनी = समूह ।
हरियाई = वर्षा ऋतु में । घायनि = घावों । जात = चले जाने पर । ललात = लाला ।
दिख-साध = देखने की इच्छा । अनी = सेना ,समूह । बिरह-बिधु = विपरीत ।
चंद्रहास = तलवार,चाँदनी । घनी = अधिक । घाम = गर्मी । बिधना = ब्रह्मा । फरद =सूची
दवामी = दावाग्नि । निषंग = तरकस । कुसुमायुध = मदन । मानस = मनरूपी सरोवर ।
हुलास = उमंग । बतास = वायु वात । अनत = अन्यत्र । जीवन = जल । बारिनि = बगीचों ।
लौं = समान । पैरिबौ = तैरना । सर-ताज = श्रेष्ठ । भौन = भवन । ताजन = ताड़ना ।

गुंज = आनंद ध्वनि । उमाहे = उमड़ी । मही = मट्ठा । दलकति = पीड़ा के कारण ।
भाषन = संदेश की इच्छा । महि = ब्रजभूमि । ब्यौंत = ढंग । फुरति = स्फूर्ति । ही =
हृदय । ताप = गरमी । नैंकु डंक लागै = नोक के लगते ही । चाँपि = दबाकर । हलबल =
शीघ्रता । अबिरल = घने । अचल = पर्वत । चल =गतिशील । गरुवाई-गुन = भारी-गुन ।
हमेव-हरुवाई = अहंभाव हलकापन । बहिराइ = दूर । तमाई = अंधकार, तमोगुण ।
धौंक = धौंकनी । धमाइ = तान । कोदनि = दिशाओं । मुरकाइ = छिड़ककर ।
नीठि = बलात । दीठिनि = ब्रजवासियों की । ऊने = कम । पारद = पारा । दंम = ढोंग ।
भवि = भावो । अमित अनेक । गुनीली = गुणवान । घट-अंतर = हृदय । भायनि = भावों ।
सूधौ = सरल सी । जतन = विधि । गरब-गढ़ी । अवाई = आगमन । दरि लेत = नष्ट कर दे तो ।
सारत = पोंछना । बँहोलिनि = भुजाओं से । थिराए = स्थिर । कीरति-कुमारी = कुमारी-
गोपियों । सद्य = शीघ्र । पुहमी = पृथ्वी । फुरन-देहु = कहने दो । प्रपंच = जाल ।
सरि = ठीक । आतुर = व्यग्र । कातर = दुखी । थिर = स्थिर । हिरानी = भूल गयी ।
उधिरानी = तितर-बितर । बिलानी = विलीन । दरेरनि = रगड़ । काली-मुख = कालीयनाग मुख ।
सिवान = सीमा । कसाले = कष्ट । कैधौं = अथवा । बारिद = मेघ । उपच्यौ = उबलकर बाहर
निकल आया । हरि-हरि = वाटिका के पेड़ पौधे । बारि = युवतियाँ । बरसाने = कौन सा जल
बरस रहा है । सूछम = सूक्ष्म । साँठी = निर्गुण (पूंजी,धन) । हिरान्यौ = भूल गया ।
नाठी = नष्ट । हेरि = देख । राखन = रक्षा के लिए । ब्यौंत = उपाय । गढ़ यौ आवै है =
दुख उमड़कर आने वाला है । धीरज-धुरीन = धारण करने में प्रवीण । छावते = बनाते ।
रौन-रैती = बालू की भूमि । चितावन = सचेत । भाठी = भट्ठी । लुकाठी = धोकनी ।
अदाग = निर्दोष । सुबृत = छंद बातचीत ।
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इतिश्री

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