उध्दव जी के कवित्त

उद्धव के मथुरा लौट आने के समय के कवित्त
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121
चल-चित-पारद की दंम-कंचुली कै दूरि
ब्रज-मग-धूरि प्रेम-मूरि सुभ-सीली लै ।
कहै रतनाकर सु जोगनि बिधान भावि
अमित प्रमान ज्ञान-गंधक गुनीली लै ।।
जारि घट-अंतर हीं आह-धूम धारि सबै
गोपी बिरहागिनि निरंतर जगीली लै ।
आए लौटि ऊधव बिभूति भव्य भायनि की

कायनि की रुचिर रसायन रसीली लै ।।

122
आए लौटि लज्जित नवाए नैन ऊधौ अब
सब सुख-साधन कौ सूधौ सौ जतन लै ।
कहै रतनाकर गँवाए गुन गौरव औ
गरब-गढ़ी कौ परिपूरन पतन लै ।।
छाए नैन नीर पीर-कसक कमाए उर
दीनता अधीनता के भार सौं नतन लै ।

प्रेम-रस रुचिर बिराग-तूमड़ी मैं पूरि
ज्ञान-गूदड़ी मैं अनुराग सौ रतन लै ।।

123
आए दौरि पौरि लौं अवाई सुन ऊधव की
और ही विलोकि दसा दृग भरि लेत हैं ।
कहै रतनाकर विलोकि बिलखात उन्हैं
येऊ कर काँपत करेजैं धरि लेत हैं ।।
आवति कछूक पूछिबे औ कहिबै की मन
परत न साहस पै दोऊ दरि लेत हैं ।
आनन उदास, साँस भरि उकसौंहैं करि
सौंहैं करि नैननि निचौंहैं करि लेत हैं ।।

124
प्रेम-मद-छाके पग परत कहाँ के कहाँ
थाके अंग नैननि सिथिलता सुहाई है ।
कहै रतनाकर यौं आवत चकात ऊधौ
मानौ सुधियात कोऊ भावना भुलाई है ।।
धारत धरा पै ना उदार अति आदर सौं
सारत बँहोलिनि जो आँसू-अधिकाई है ।
एक कर राजै नवनीत जसुदा को दियौ
एक कर बंसी बर राधिका-पठाई है ।।

125
ब्रज-रजरंजित सरीर सुभ ऊधव कौ
धाइ बलबीर ह्वै अधीर लपटाए लेत ।
कहै रतनाकर सु प्रेम-मद-माते हेरि
थरकति बाँह थामि थहरि थिराए लेत ।।
कीरति-कुमारी के दरस-रस सद्य ही की
छलकनि चाहि पलकनि पुलकाए लेत ।
परन न देत एक बूँद पुहुमी की कोंछि
पोंछ-पोंछि पट निज नैननि लगाए लेत ।।

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