उध्दव जी के कवित्त

उद्धव के ब्रज से लौटते समय के कवित्त
……………………………………………………………

117
गोपी, ग्वाल, नंद, जसुदा सौं तौ ह्वै उठे
उठत न पाय पै उठावत डगत हैं ।
कहै रतनाकर सँभारि सारथी पै नीठि
दीठनि बचाइ चल्यो चोर ज्यौं भगत हैं ।।
कुंजनि की कूल की कलिंदी की रुऐंदी दसा
देखि-देखि आँस औ उसाँस उमगत हैं ।
रथ तैं उतरि पथ पावन जहाँ हीं तहाँ
बिकल बिसूरि धूरि लोटन लगत हैं ।।

118
भूले जोग-छेम-प्रेम नेमहिं निहारि ऊधौ
सकुचि समाने उर-अंतर हरास लौं ।
कहै रतनाकर प्रभाव सब ऊने भए ।
सूने भए नैन बैन अरथ-उदास लौं ।।
माँगी बिदा माँगत ज्यौं मीच उर भीचि कोऊ
कीन्यौ मौन गौन निज हिय के हुलास लौं ।
बिथकित साँस-लौ चलत रुकि जात फेरि
आँस लौं गिरत पुनि उठत उसास लौं ।।

Leave a Reply

Are you human? *