उध्दव जी के कवित्त

उद्धव के ब्रज से बिदा होते समय के कवित्त
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109

धाईं जित-तित तैं बिदाइ-हेत ऊधव की
गोपी भरीं आरति सँम्हारति न साँसुरी ।
कहै रतनाकर मयूर-पच्छ कोऊ लिए
कोऊ गुंज-अंजली उमाहे प्रेम-आँसुरी ।।
भाव-भरी कोऊ लिए रुचिर सजाव दही
कोऊ मही मंजु दाबि दलकति पाँसुरी ।
पीट पट नंद जसुमति नवनीत नयौ
कीरति-कुमारी सुरवारी दई बाँसुरी ।।

110
कोऊ जोरि हाथ कोऊ नाइ नम्रता सौं माथ
भाषन की लाख लालसा सौं नहि जात हैं ।
कहै रतनाकर चलत उठि ऊधव के
कातर प्रेम ह्वै सौं सकल महि जात हैं ।।
सबद न पावत सो भाव उमगावत जो
ताकि-ताकि आनन ठगे से ठहि जात हैं ।
रंचक हमारी सुनौ रंचक हमारी सुनौ
रंचक हमारी सुनौ कहि रहि जात हैं ।।

111
दाबि-दाबि छाती पाती-लिखन लगायौ सबै
ब्यौंत लिखिबै कौ पै न कोऊ करि जात है ।
कहै रतनाकर फुरति नाहिं बात कछू
हाथ धर््यौ ही तल थहरि थरि जात है ।।
ऊधौ के निहोरैं फेरि नैंकु धीष जोरैं पर
ऐसौ अंत ताप कौ प्रताप भरि जात है ।
सूखि जाति स्याही लेखिनी कैं नैंकु डंक लागैं
अंक लागैं कागद बररि बरि जात है ।

112
कोऊ चले काँपि संग कोऊ उर चाँपि चले
कोऊ चले कछुक अलापि हलबल से ।
कहै रतनाकर सुदेस ताजि कोऊ चले

कोऊ चले कहत सँदेस अबिरल से ।।
आँसू चले काहू के सु काहू के उसाँस चले
काहू के हियै पै चंदहास चले हल से ।
ऊधव कौं चलत चलाचल चली यौं चल
अचल चले और अचले हू भए चल से ।।

113

दीन्यौ प्रेम-नेम-गरुवाई-गुन ऊधव कौं
हिय सौं हमेव-हरुवाई बहिराइ कै ।
कहै रतनाकर त्यौं कंचन बनाई काय
ज्ञान-अभिमान की तमाई बिनसाइ कै ।।

बातनि की धौंक सौं धमाइ चहुँ कोदनि सौं
निज बिरहानल तपाइ पघिलाइ कै ।
गोप की बधूटी प्रेम-बूटी के सहारे मारे
चल-चित-पारे की भसम मुरकाइ कै ।।

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