उध्दव जी के कवित्त

श्री उद्धव-वचन ब्रजवासियों से
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चाहत जौ स्वबस सँजोग स्याम-सुन्दर कौ
जोग के प्रयोग मैं हियौ तौ बिलस्यौ रहै ।
कहै रतनाकर सु-अंतर-मूखी है ध्यान
मंजु हिय-कंज-जगी जोति मैं धस्यौ रहै ।।
ऐसैं करौं लीन आतमा कौं परमातमा मैं
जामैं जड़-चेतन-बिलास बिकस्यौ रहै ।
मोह-बस जोहत बिछोह जिय जाकौ छोहि
सो तौ सब अंतर-निरंतर बस्यौ रहै ।।

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पंच तत्व मैं जो सच्चिदानँद की सत्ता सो तौ
हम तुम उनमैं समान ही समोई है ।
कहै रतनाकर बिभूति पंच-भूत हू की
एक ही सी सकल प्रभूतनि मैं पोई है ।।
माया के प्रपंच ही सौं भासत प्रभेद सबै
काँच-फलकनि ज्यौं अनेक एक सोई है ।
देखौ भ्रम-पटल उघारि ज्ञान-आँखिनि सौं
कान्ह सब ही मैं कान्ह ही मैं सब कोई है ।।

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सोई कान्ह सोई तुम सोई सबही हैं लखौ
घट-घट-अंतर अनंत स्यामघन कौं ।
कहै रतनाकर न भेद-भावना सौं भरौ
बारिधि औ बूँद के बिचारि बिछुरन कौं ।।
अबिचल चाहत मिलाप तौ बिलाप त्यागि
जोग जुगती करि जुगावौ ज्ञान -धन कौं ।
जीव आतमा कौं परमातमा मैं लीन करौ
छीन करौ तन कौं न दीन करौ मन कौं ।।

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सुनि सुनि ऊधव की अकह कहानी कान
कोऊ थहरानी, कोऊ थानहिं थिरानी हैं ।
कहै रतनाकर रिसानी, बररानी कोऊ
कोऊ बिलखानी, बिकलानी, बिथकानी हैं ।।
कोऊ सेद-सानी, कोऊ भरि दृग-पानी-रहीं
कोऊ घूमि-घूमि परीं भूमि मुरझानी हैं ।
कोऊ स्याम-स्याम कै बहकि बिललानी कोऊ
कोमल करेजौ थामि सहमि सुखानी हैं ।।

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